पूनम का अंतिम निर्णय: एक अधूरा रिश्ता, एक नई शुरुआत

पूनम का अंतिम निर्णय: एक अधूरा रिश्ता, एक नई शुरुआत-भाग 18

सुबह का समय था। सड़कें जीवन से भर रही थीं—छात्र अपने-अपने स्कूल की ओर बढ़ रहे थे, और पूनम भी अपने काम पर निकल चुकी थी। जब वह पास के बगीचे से गुज़री, तो उसकी नज़र अचानक रोनी पर पड़ी। वह एक लड़की के साथ मुस्कुराते हुए टहल रहा था। पूनम ने पल भर के लिए ठहरकर देखा, फिर अनदेखा करने की कोशिश करते हुए आगे बढ़ गई।

लेकिन रोनी की नज़र उस पर पड़ गई। वह तुरंत उसकी ओर दौड़ा।

“मैडम, रुकिए… मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ,” उसने हाँफते हुए कहा।

पूनम ने खुद को संयत किया और हल्की मुस्कान के साथ रुक गई। “क्या बात है, रोनी?”

“आप मुझसे मिलने क्यों नहीं आईं?” उसकी आवाज़ में शिकायत थी, और आँखों में उम्मीद।

पूनम का अंतिम निर्णय: एक अधूरा रिश्ता, एक नई शुरुआत

पूनम ने गहरी सांस ली। “रोनी, मैं काम और घर की जिम्मेदारियों में उलझी रही। अब मेरे पति लौट आए हैं… मेरे पास अब वो खाली समय नहीं है।”

“क्या? आपके पति वापस आ गए?” रोनी की आँखों में हलचल थी।

पूनम ने उसकी ओर देखा, फिर उस लड़की की ओर इशारा किया जो कुछ दूरी पर खड़ी थी। “तुम्हारी खूबसूरत गर्लफ्रेंड तुम्हारा इंतज़ार कर रही है। उसके साथ रहो। हमारे बीच जो भी था, वो अब खत्म होना चाहिए। ये तुम्हारे लिए, तुम्हारी गर्लफ्रेंड के लिए और मेरे पति के लिए सही नहीं है। मैंने हमारे गुप्त रिश्ते को अलविदा कहने का फैसला कर लिया है। तुम अच्छे इंसान हो, और मैं तुम्हें हमेशा एक मीठी याद की तरह संजोकर रखूंगी।”

रोनी की आँखें नम थीं। “मैं समझता हूँ, मैडम… लेकिन क्या हम कभी थोड़ी देर के लिए मिल सकते हैं? बस एक बार…”

पूनम उसकी आँखों में देख रही थी। वहाँ मासूमियत थी, एक अधूरी चाहत।

“ठीक है,” उसने धीमे स्वर में कहा, “मैं कोशिश करूँगी। लेकिन तुम मुझसे वादा करो कि अपनी गर्लफ्रेंड को खुश रखोगे।”

“मैं वह सब करूंगा जो आप चाहती हैं। बस एक बार फिर मिलिए मुझसे,” रोनी ने कहा।

पूनम उलझन में थी। दिल और दिमाग के बीच एक खामोश लड़ाई चल रही थी। “मैं कोशिश करूंगी,” उसने कहा। “अब जाओ, वह तुम्हारा इंतज़ार कर रही है।”

पूनम ने अपने कदम फिर से आगे बढ़ा दिए। रोनी धीरे-धीरे अपनी गर्लफ्रेंड की ओर लौट गया।

पूनम जानती थी—रोनी अभी युवा था। उसे इस रिश्ते की गहराई और उसकी सीमाओं को समझने में वक्त लगेगा। लेकिन उसने जो फैसला लिया था, वह उसके आत्मसम्मान और रिश्तों की मर्यादा के लिए ज़रूरी था।

पूनम आगे बढ़ रही थी, लेकिन उसके मन में हलचल थी। हर कदम के साथ एक स्मृति पीछे छूट रही थी। रोनी की आँखों की मासूमियत, उसकी आवाज़ की कंपकंपी… सब कुछ जैसे हवा में गूंज रहा था। उसने खुद को समझाया—यह सही है, यही करना चाहिए। लेकिन दिल ने धीरे से पूछा, “क्या भावनाएँ इतनी आसानी से खत्म हो जाती हैं?” उसने अपने बैग से रुमाल निकाला और आँखों की कोरें पोंछीं। जीवन आगे बढ़ता है, और पूनम भी। पीछे छूटे रिश्ते अब सिर्फ यादें हैं—मीठी, कड़वी, लेकिन ज़रूरी।

पूनम ने सुबह की चाय के बाद लाइब्रेरी में अपना दैनिक कार्य शुरू कर दिया। किताबों की खुशबू और पाठकों की जिज्ञासा से माहौल जीवंत हो उठा था। कई लोग मदद की तलाश में थे, और पूनम अपनी जिम्मेदारियों में डूब गई। समय जैसे पंख लगाकर उड़ गया।

शाम ढलने लगी। जब वह घर लौटने की तैयारी कर रही थी, उसकी नज़र सामने की मेज़ पर बैठे आदित्य पर पड़ी। वह शांत भाव से बैठा था, जैसे किसी पुराने वादे का इंतज़ार कर रहा हो। पूनम को याद आया—आज आदित्य उससे मिलने वाला था, लेकिन वह तो भूल ही गई थी।

“नमस्ते आदित्य जी,” पूनम ने मुस्कराते हुए कहा, “आप कब आए?”

“कुछ देर पहले,” आदित्य ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया। “मैंने देखा आप काम में डूबी थीं, इसलिए इंतज़ार करने लगा।”

“हां, आज का दिन बहुत व्यस्त था,” पूनम ने सिर झुकाते हुए कहा। “आपका दिन कैसा रहा?”

“कुछ खास नहीं,” आदित्य ने कहा। “एक ग्राहक के लिए पेंटिंग पूरी की थी, उसे देने के बाद सीधे यहां चला आया।”

“तो आप अपनी पेंटिंग्स बेचते भी हैं?” पूनम ने आश्चर्य से पूछा।

“हां, पूनम जी। पेट भरने के लिए कुछ तो करना पड़ता है,” आदित्य ने मुस्कराते हुए कहा, लेकिन उसकी आँखों में एक गहराई थी।

पूनम ने घड़ी की ओर देखा। “मुझे खेद है, आदित्य जी। मैं आपसे ज्यादा बात नहीं कर सकती। मुझे घर जाना है। कृपया अपना पता दीजिए, मैं कल आपके घर आऊंगी।”

“ठीक है,” आदित्य ने कहा। “क्या आप चाहेंगी कि मैं आपकी पेंटिंग बनाऊं? मुझे तैयारी करनी होगी।”

“हां, मैं तैयार हूं,” पूनम ने मुस्कराते हुए कहा। उसने आदित्य से पता लिया और धीरे-धीरे अपने कार्यालय की ओर बढ़ गई।

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