बस की एक शाम – एक नई शुरुआत की आशा

बस की एक शाम, एक नई शुरुआत की आशा -भाग 12

देर शाम का वक्त था। पूनम अपने पुराने दोस्त से मिलकर घर लौट रही थी। बस यात्रियों से भरी हुई थी, लेकिन पूनम की आंखें बाहर अंधेरे में कुछ ढूंढ रही थीं—शायद दिनभर की बातचीत के बाद थोड़ी शांति, थोड़ी राहत। शहर की रोशनी धीरे-धीरे धुंधली हो रही थी, और पूनम की सोचें गहराती जा रही थीं।

बस एक झटके से रुकी और कुछ नए यात्री चढ़े। उनमें एक व्यक्ति था—करीब 35 साल का, हल्की दाढ़ी, आँखों में गहराई और चेहरे पर एक शांत मुस्कान। वह पूनम के पास वाली सीट पर बैठ गया। उसने बैठते ही हल्के स्वर में कहा, “अगर आपको ऐतराज़ न हो तो मैं यहाँ बैठ जाऊं?”

पूनम ने सिर हिलाकर इजाज़त दी। उसकी आवाज में विनम्रता थी, और आँखों में एक अजनबीपन जो आकर्षक लग रहा था।

कुछ मिनटों तक दोनों चुप रहे। बस की खिड़की से बाहर अंधेरा और रोशनी की लुका-छिपी चल रही थी। 

बस की एक शाम, एक नई शुरुआत की आशा

फिर उस व्यक्ति ने धीरे से कहा, “आपका चेहरा कुछ सोचता हुआ लग रहा है… क्या मैं पूछ सकता हूँ कि आप ठीक हैं?”

पूनम ने उसकी तरफ देखा, थोड़ी हैरानी और थोड़ी मुस्कान के साथ। “हाँ, बस थक गई हूँ। दिनभर की भागदौड़ के बाद अब घर लौट रही हूँ।”

उसने अपना नाम बताया—“मैं आदित्य हूँ।”

पूनम ने भी अपना नाम बताया। बातचीत धीरे-धीरे आगे बढ़ी। आदित्य की बातें शालीन थीं, उसके शब्दों में कोई बनावटीपन नहीं था। वह पूनम की बातों को ध्यान से सुनता, बीच-बीच में हल्के मज़ाक करता, लेकिन हर बार उसकी बातों में एक सम्मान झलकता।

पूनम को हैरानी हो रही थी कि एक अनजान व्यक्ति से बात करना उसे अच्छा लग रहा था। आदित्य ने बताया कि वह एक पेंटर है, और अक्सर लोगों की पेंटिंग बनाता है।

“आप तो बहुत अच्छे पेंटर लगते हैं, इतनी खूबसूरती से बातें करते हैं,” पूनम मुस्कुरा दी।

आदित्य ने जवाब दिया, “ऐसा इसलिए है क्योंकि मैं ऐसी पेंटिंग्स बनाता हूँ जो कहानियाँ कहती हैं। अब मैं एक ऐसी पेंटिंग बनाना चाहता हूँ जो एक युवा लड़की के अधूरे सपनों को प्रस्तुत करे।”

पूनम चुप हो गई। उसकी आँखें फिर से खिड़की की ओर चली गईं। बस धीरे-धीरे अपने गंतव्य की ओर बढ़ रही थी।

कुछ देर बाद आदित्य ने पूछा, “क्या आप कभी किसी अजनबी से बात करके ऐसा महसूस करती हैं कि जैसे वो आपको पहले से जानता हो?”

पूनम ने कहा, “आज पहली बार ऐसा हो रहा है।”

“अगर आपको कोई आपत्ति न हो तो मैं आपकी पेंटिंग बनाना चाहता हूँ,” आदित्य ने कहा।

पूनम हँसी और बोली, “मैं उस पेंटिंग का क्या करूँगी?”

“कुछ पेंटिंग्स अधूरे सपनों को पूरा करती हैं। आपको एक बार कोशिश करनी चाहिए,” आदित्य ने गंभीरता से कहा।

पूनम को सब कुछ समझ नहीं आया, लेकिन उसे वह आदमी दिलचस्प लगा। उसकी बातों में एक गहराई थी, जो पूनम को छू रही थी।

“देखते हैं, अगर हम फिर मिलें  तो आप मेरी पेंटिंग बना सकते हैं।”

“शुक्रिया पूनम जी। हम मिलेंगे,” यह कहकर आदित्य बस से बाहर चला गया।

पूनम कुछ देर तक खिड़की से बाहर देखती रही। उसकी सोचें अब आदित्य की बातों के इर्द-गिर्द घूम रही थीं। क्या सच में कोई पेंटिंग अधूरे सपनों को पूरा कर सकती है?

जब पूनम घर पहुंची तो उसका पति रिंकू पहले से ही बिस्तर पर था।

“तुम किस दोस्त से मिलने गई थी, पूनम? वह कैसी है?” रिंकू ने पूछा।

“वह ठीक है। उसने आपको नमस्ते भेजा है,” पूनम ने शॉवर की ओर बढ़ते हुए कहा।

वह शॉवर के नीचे बैठ गई। गिरता पानी उसे शांति और आराम दे रहा था। वह अपना सारा दर्द और तनाव भूल गई। दिनभर की थकान, भावनात्मक उलझनें और आदित्य की बातें—सब कुछ पानी के साथ बहता जा रहा था।

जब वह बाहर आई, तो रिंकू सो चुका था। वह रिंकू के साथ अपने दोस्त के बारे में बात करना चाहती थी। यह कोई नई बात नहीं थी कि रिंकू उसका इंतजार किए बिना सो गया हो।

बस की एक शाम, एक नई शुरुआत की आशा

पूनम बिस्तर पर लेट गई और अपनी सहेली के सुझावों के बारे में सोचने लगी। उसकी सहेली ने उसकी मदद करने का वादा किया था, लेकिन उसके सुझाव विस्फोटक थे। पूनम रिंकू के साथ अपनी समझ को बेहतर बनाने के लिए कुछ भी करने को तैयार थी।

उसकी सहेली ने कहा था, “अगर तुम चाहती हो कि रिंकू तुम्हें समझे, तो तुम्हें पहले खुद को समझाना होगा। अपनी भावनाओं को दबाना बंद करो।”

वह सोच रही थी कि क्या आदित्य जैसे लोग इसलिए आकर्षक लगते हैं क्योंकि वे बिना किसी अपेक्षा के बात करते हैं? क्या वह खुद को रिंकू के सामने खुलकर रख पाती है?

उसने तय किया कि वह रिंकू से फिर से बात करेगी। वह उसे बताएगी कि वह क्या महसूस करती है, क्या चाहती है, और क्या खो चुकी है। शायद यह बातचीत उनके रिश्ते को एक नई दिशा दे।

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