एक पेंटिंग, एक कहानी और एक नई शुरुआत-भाग 15
वृद्ध महिलाओं से मुलाकात:
लाइब्रेरी में पूनम की मुलाकात एक वृद्ध महिला से हुई। वह “बूढ़े आदमी का युवा प्यार” नाम की एक किताब ढूंढ रही थी। पूनम ने कुछ देर रैक खंगालने के बाद वह किताब ढूंढ ली और मुस्कुराते हुए उसे दे दी।
“दादी माँ, क्या मैं आपसे कुछ पूछ सकती हूँ?” पूनम ने विनम्रता से कहा।
“हाँ बेटी, पूछो,” बूढ़ी महिला ने कुर्सी पर बैठते हुए जवाब दिया। शायद उन्हें खड़े होने में कुछ परेशानी थी।
“आप स्वयं यह पुस्तक पढ़ना चाहती हैं या किसी और के लिए ले रही हैं?” पूनम ने उत्सुकता से पूछा।
बूढ़ी महिला ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “बेटी, मैंने यह तुम्हारे दादाजी के लिए ली है। वे अब भी युवा लड़कियों को पसंद करते हैं। मैं अब वह सब नहीं कर सकती जो उन्हें पसंद है। पर जब मैं जवान थी, तो बहुत सक्रिय थी।”
पूनम थोड़ी हैरान हुई, फिर बोली, “दादी माँ, अगर उन्हें कोई दूसरी औरत मिल गई तो आपको बुरा नहीं लगेगा?”
बूढ़ी महिला हँस पड़ीं। “उसे कोई लड़की नहीं मिलेगी, मुझे पूरा यकीन है। वह सिर्फ किताबों में ही अपने सपनों की दुनिया ढूंढता है। असल ज़िंदगी में वह मुझसे ही बंधा है।”
पूनम ने उनकी बातों में एक गहरा आत्मविश्वास और अपनापन महसूस किया। वह सोचने लगी कि उम्र चाहे जो भी हो, प्यार और रिश्तों की गहराई कभी कम नहीं होती।
बूढ़ी महिला ने किताब अपने बैग में रख ली और धीरे-धीरे दरवाजे की ओर बढ़ने लगीं। पूनम ने उन्हें सहारा देने की पेशकश की, लेकिन उन्होंने मुस्कुराकर मना कर दिया।
“बेटी, जब तक चल सकती हूँ, चलूँगी। किताबें तो सहारा देती हैं, पर पैरों को चलना खुद ही पड़ता है,” उन्होंने कहा।
पूनम ने रैक पर किताबें ठीक करना शुरू कर दिया, लेकिन मन में दादी माँ की बातों की गूंज रह गई। वह सोचने लगी कि हर किताब के पीछे कोई कहानी होती है, और हर पाठक के पास एक जीवन।
लाइब्रेरी की खामोशी में वह मुस्कुराई। आज उसने सिर्फ एक किताब नहीं दी थी, बल्कि एक रिश्ते की झलक देखी थी—जो उम्र से परे था।
एक नई शुरुआत:
पूनम लाइब्रेरी में काम कर रही थी। किताबों की रैक ठीक करते हुए वह अपने काम में मग्न थी, तभी एक आवाज ने उसका ध्यान खींचा।
“नमस्ते पूनम जी, कैसी हो आप?”
पूनम ने पीछे देखा। आदित्य मेज के पास खड़ा था। उसकी आँखें चमक उठीं।
“नमस्ते आदित्य, कैसे हो आप?”
“मैं ठीक हूँ, पूनम जी।”
“तो आपने मुझे ढूंढ ही लिया,” पूनम मुस्कुराई।
आदित्य हँसा और बोला, “मैंने तुमसे कहा था कि हम फिर मिलेंगे।”
“आओ, यहाँ बैठो,” पूनम ने एक मेज की ओर इशारा करते हुए कहा। दोनों बैठ गए। पूनम ने बताया कि अब वह हर पेंटिंग में छिपी कहानियों को खोजने की कोशिश करती है।
“क्या आप यहाँ कोई किताब ढूंढ रहे हैं, आदित्य जी? मैं यहाँ काम कर रही हूँ।”
“नहीं-नहीं, मैं आपसे मिलने आया हूँ। मुझे पता था कि आप यहाँ काम करती हैं। मैंने आपको दो दिन पहले लाइब्रेरी में देखा था।”
“दो दिन पहले? फिर आप मुझसे बात करने क्यों नहीं आए?” पूनम ने उत्सुकता से पूछा।
“दरअसल, मैं आपके लिए एक पेंटिंग बनाना चाहता था। यह रही वह पेंटिंग आपके लिए।”
आदित्य ने एक पैकेज पूनम को दिया। उसने उसे खोला और देखा—यह उसके चेहरे की पेंटिंग थी। पूनम आश्चर्यचकित रह गई।
“यह तो बिल्कुल मेरा चेहरा है! धन्यवाद, आप महान चित्रकार हैं,” पूनम ने पेंटिंग को पुनः पैक करते हुए कहा।
“धन्यवाद पूनम जी। आपकी पेंटिंग आपकी तरह दिखनी चाहिए, अन्यथा यह आपके और पेंटिंग के साथ अन्याय होगा।”
“आप बहुत अच्छी बातें करते हैं। आप एक बेहतरीन लेखक भी हो सकते हैं।”
“पूनम जी, मैं चित्रों के माध्यम से कहानियाँ लिखता हूँ।”
“लेकिन आदित्य, आपने मेरे पूरे शरीर की नहीं, केवल चेहरे की पेंटिंग क्यों बनाई?”
आदित्य कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “पूनम जी, मैं केवल वही पेंट करता हूँ जो मैं देखता हूँ। यदि आप पूरे शरीर की पेंटिंग चाहती हैं, तो इसका निर्णय आपको ही लेना होगा। मैं तो केवल चित्रकार हूँ।”
पूनम मुस्कुराई और हल्का सा शर्मा गई।
“मुझे आपकी पेंटिंग बहुत पसंद आई। मैं आपसे और बात करना चाहती हूँ। आप फिर यहाँ कब आएँगे? अब मेरा काम करने का समय है।”
“अगर आप चाहें, तो मैं अगले सप्ताह बुधवार को आ सकता हूँ।”
“अच्छा, मैं दोपहर दो बजे के आसपास मुक्त हो जाऊँगी। फिर हम और बात कर सकते हैं।”
आदित्य मुस्कुराया और धीरे-धीरे लाइब्रेरी से बाहर चला गया। पूनम की आँखों में एक नई चमक थी—शायद एक नई कहानी की शुरुआत।